नंगा न्याय

साहित्य

वो भीड़
जो स्त्री को नग्न करके
पूरे शहर में घुमाती हैं,
किस देश की है?
मुझे बताओ..
मैं भूल गया हूँ
मुझे ये भी बताओ कि
ये किस युग की दुघर्टना है
मुझे समय का होश नहीं है,
उस भीड़ में किसी एक का भी
मालूम हो जाए कि
वो किस रब को मानता है,
मैं भूल जाना चाहूँगा
मेरी सारी आस्तिकता,
उस भीड़ में
पढ़े लिखे लोग थे
अगर..अगर
तो मैं कसम देता हूँ
सारी विद्याओं को
कि मुझसे छीन ले आकर
मेरा सारा ज्ञान,
उस स्त्री को
बिना आवरण
जिन्होंने देखा है
अपनी नंगी आंखों से
मुझे बताओ
वो किस समाजों से थे
मैं भूल गया हूँ मेरी सभ्यता
मैं चला गया हूँ पाषाण युग में,
वो भीड़
जो अपने गुस्से को
यूँ निकालती है
कि दुनिया की सारी लज्जा
लज्जा भी शर्मिन्दा हो जाये,
वो भीड़
किस नागरिकता को पेश करती है
किस हुकूमत को मानती है
मुझे बताओ
मुझे समझाओ
राजतंत्र, लोकतंत्र, भीड़तंत्र
मैं भूल गया हूँ संविधान
मैं भूल गया हूँ
स्त्री क्या है
मर्यादा क्या है
कपड़ा क्या है,
भीड़ का न्याय नँगा है
भीड़ को मौका मिला है
किसी को जलाने का
शरीर के वस्त्र फाड़ने का
मैं बहुत कुछ भूल गया हूँ
पर इतना याद है
कि इस भीड़ में
कोई एक भी इंसान नही है ।
कोई एक भी
पुरूष नही हैं ।
………..…….………………..……..
अवतार सिंह

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