कार्यशाला में पांचवें दिन आंकड़ा विश्लेषण एवं प्राचीन शोध पद्धति पर चर्चा

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मोतिहारी। अध्ययन एक प्रकार की समाधि प्रक्रिया है।कोई भी शोध अन्तिम सत्य को प्रतिपादित नही करता है। इस लिये सत्य एक सतत प्रक्रिया है। शोध मे हम तत्काल परिस्थितियों के आधार पर तार्किक सत्य को सिद्धांत के रुप में प्रतिपादित करते है। उक्त उद्गार बाबासाहब भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय, लखनऊ के शिक्षाशास्त्र संकाय के अधिष्ठाता प्रो. अरविंद कुमार झा ने शोध प्रविधि कार्यशाला में शोध की ज्ञान मीमांसा पर व्याख्यान देते हुये व्यक्त किये।
महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय के चाणक्य परिसर स्थित पंडित राजकुमार शुक्ल सभागार में चल रहे सात दिवसीय शोध प्रविधि कार्यशाला में पांचवें दिन शुक्रवार को प्राचीन शोध पद्धति, शोध लेखन, परिकल्पना के आयाम, प्राचीन दर्शन में ज्ञान परंपरा, शोध की विभिन्न पद्धतियों पर जैसे विषयों पर चर्चा हुई।
विश्वविद्यालय के संगणनात्मक विज्ञान, सूचना और संचार प्रौद्योगिकी संकाय द्वारा 27 जनवरी से 2 फरवरी, 2020 तक आयोजित सात दिवसीय शोध प्रविधि कार्यशाला के पांचवें दिन के पहले सत्र में गुरु गोविंद सिंह इंद्रप्रस्थ विश्वविद्यालय के पूर्व अधिष्ठाता प्रो. सी पी सिंह ने डाटा प्रोसेसिंग, टेबुलेशन, डाटा रिप्रेजेंटेशन पर चर्चा किए एवं शोधार्थियों से कहा कि शोध में डाटा के प्रति सजग रहें और उचित स्रोत से डाटा प्राप्त करें।
कार्यशाला के दूसरे सत्र में प्रो.अरविंद कुमार झा ने कहा कि शोध के प्रति ईमानदारी एवं निष्ठा रखना प्राथमिक शर्त है। शोध विषय के चयन के लिए हमेशा अच्छी पुस्तकों का अध्ययन करें, शोध के दौरान हमेशा प्रश्न पूछने की आदत डालें। पाश्चात्य व भारतीय विद्वानों की पुस्तकों का समेकित अध्ययन करें। सिद्धांतों को प्रतिपादित करने के लिए न्याय दर्शन पढ़ें।जो पुस्तकों मे लिखा मे हुआ उसे वैसा ही सत्य न मान ले। किताबों में लिखी चीजों का विश्लेषण करें।कार्यशाला के तीसरे सत्र में महामना मदनमोहन मालवीय हिंदी पत्रकारिता संस्थान वाराणसी के निदेशक प्रो. ओमप्रकाश सिंह ने वैदिक काल के दौरान शोध दर्शन, प्राचीन भारतीय अनुसंधान पद्धति, शोध समग्र, शोध के मूलतत्व, शोध परिकल्पना, अनुसंधान पद्धतियां, वैज्ञानिक शोध पद्धति, प्राथमिक शोध, द्वितीयक शोध एवं शोध पुस्तक लेखन पर व्याख्यान देते हुए सभी शोधार्थियों से कहा कि शोध की समस्या पर स्वयं सोचें, शोध समस्या का चुनाव करते समय समाज के पक्ष पर भी ध्यान दें। शोध में हमेशा प्रश्नावली बनाने की आदत डालें, शोध के क्षेत्र एवं उसके महत्व को समझें। शोध में हमेशा सजग रहने की आवश्यकता है। साथ ही उन्होंने सभी शोधार्थियों को सुझाव दिए कि आप शोध में एक से अधिक शोध पद्धति का भी प्रयोग कर सकते हैं। कार्यशाला के चौथे सत्र में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के संस्कृत विभाग के अध्यक्ष प्रो. रामनाथ झा ने प्राचीन दर्शन में ज्ञान परंपरा पर विशेष व्याख्यान देते हुए कहा कि ज्ञान के प्रति आदर भाव रखें, ज्ञान को शब्दों के माध्यम से व्यक्त करने की परंपरा पौराणिक है। श्रुति परंपरा पहले गुरुकुल में होती थी वर्तमान में यह समाप्त होती जा रही है। हमें हमेशा तथ्यों को लेकर सजग रहने की आवश्यकता है। साथ ही उन्होंने शोध में प्रयोग किए जा रहे भाषा शैली पर भी चर्चा की।
अतिथियों का स्वागत संगणनात्मक विज्ञान, सूचना और संचार प्रौद्योगिकी संकाय के अधिष्ठाता प्रो. अरुण कुमार भगत ने किया। संचालन कार्यशाला संयोजक एवं मीडिया अध्ययन विभाग के सहायक प्राध्यापक डॉ. परमात्मा कुमार मिश्र ने किया ।कार्यशाला के प्रबंधन में रजनीश कुमार त्रिपाठी, नवीन तिवारी, कुमार मौसम, विकास कुमार, शैलेंद्र पाण्डेय, शोभित सुमन, हरिओम, अभिजीत, चिनमई आदि ने सहयोग प्रदान किया।

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