MGCU में सामाजिक-आर्थिक व्‍यवस्‍था और नौकरशाही का भारतीय अनुभव’ विषय पर एक दिवसीय राष्‍ट्रीय संगोष्‍ठी का आयोजन

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Motihar /Nakul Kumar
 जस्टिस डिलीवरी सिस्‍टम को दुरुस्‍त किये बिना नौकरशाही का चरित्र जन हितैषी नहीं बनाया जा सकता
मोतिहारी। महात्‍मा गाँधी केंद्रीय विश्‍वविद्यालय के समाजशास्‍त्र एवं सामाजिक नृतत्‍वशास्‍त्र विभाग की और से ‘सामाजिक-आर्थिक व्‍यवस्‍था और नौकरशाही : भारतीय अनुभव’ विषय पर एक दिवसीय राष्‍ट्रीय संगोष्‍ठी का आयोजन किया गया। जिसमें केंद्र और बिहार के कई नौकरशाहों ने शिरकत करते हुए, इस विषय पर अपने जमीनी अनुभव साझा किये।
मुख्‍य वक्‍ता के रूप में ए.के. अम्‍बेडकर, एडीजी, बिहार पुलिस ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि पहले व्‍यवस्‍था का चरित्र जातीय और वंशानुगत हुआ करता था। किंतु आधुनिक राष्‍ट्र राज्‍य में व्‍यवस्‍था को ए‍क हद तक तक लोकतांत्रिक बनाने का प्रयास किया गया है। उन्होने बताया कि आधुनिक नौकरशाही अंग्रेजों की देन है। किंतु अंग्रेजों ने जो नौकरशाही यहाँ स्‍थापित की, उसका उद्देश्‍य जनता की सेवा करना न होकर शासन में बैठे अंग्रेजों के हितों की रक्षा करना था।
एडीजी  श्री अंबेडकर  ने  वर्तमान नौकरशाही के औपनिवेशिक चाल चलन पर चिंता जाहिर करते हुए कहा कि आजादी के बाद भी हम नौकरशाही के औपनिवेशिक चाल-चलन से पूर्णत: मुक्‍त नहीं हो पाये हैं। इसके कारण की ओर इशारा करते हुए उन्होंने कहा कि इस समस्या का  सबसे बड़ा कारण यह है कि हमारे यहां लोकतंत्र बाद में आया एवं नौकरशाही पहले आयी। श्री अंबेडकर ने एक प्रशासक के रूप में अपने अनुभवों के आधार पर रेखांकित किया कि हमारे देश की नौकरशाही जनता से सीधा संवाद स्‍थापित करने में असफल रही है। जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्र की सीमाओं से वह मुक्‍त नहीं हो पाई है। राजनेताओं और पूँजीपतियों के अनैतिक दबावों से मुक्‍त हो अपने विवेक से स्‍वतंत्र निर्णय लेने वाले प्रशासक अपवाद स्‍वरूप ही नज़र आ पाते हैं। बिहार में भू सुधारों के क्रियान्‍वयन में जिसप्रकार से नौकरशाही असफल हुई, उसे आपने विशेषाधिकार प्राप्‍त वर्गों द्वारा लगाये जाने अवरोधों के रूप में दिखाया है । देश की नौकरशाही में सामाजिक बदलावकारी योजनाओं के प्रति प्रतिबद्धता के अभाव हैं । नौकरशाही के बदलते परिदृश्‍य पर बोलते हुए एडीजी श्रीअम्बेडकर ने  मुख्‍यत: दो चीजों को स्‍पष्‍ट किया – घर व कार्यालय का अंतर खत्‍म हो जाना और नौकरशाही में विद्यमान वर्चस्‍व का खत्‍म हो जाना।
पहले सत्र के द्वितीय वक्‍ता श्री अनिल किशोर यादव जी, आई जी (प्रशिक्षण), बिहार पुलिस ने बताया कि कानून की नज़र में चाहे हम सब बराबर हो किंतु व्‍यवहार में हमारे यहाँ भयावह गैर बराबरी और जातिवादी पूर्वाग्रह हैं और पुलिस विभाग तक उससे बचा हुआ नहीं है। महाराष्‍ट्र की एक युवा महिला आईपीएस अधिकारी के एक वाइरल वीडियो के आधार पर उन्होने दिखाया कि पुलिस विभाग के उच्‍च पदाधिकारी किसप्रकार अनुसूचित जाति और मुसलिम अल्‍पसंख्‍यकों के प्रति ज़हर से भरे हुए हैं। संविधान का रट्टा लगाकर यूपीएससी की कठिन परीक्षा उत्‍तीर्ण करने वाले लोगों में संविधान के प्रति सम्‍मान के न होने पर उन्होनें विशेष रूप से अपना व्‍याख्‍यान केंद्रित किया। पैसों के मामले में ईमानदार किंतु जाति और धर्म के मामले में भ्रष्‍ट प्रशासकों को सुधारने के लिए जस्टिस डिलेवरी सिस्‍टम को क्रियान्वित करने पर बल दिया। आपने अपने व्‍याख्‍यान के अंत में कहा कि तंत्र का अच्‍छा-बुरा होना, तंत्र को चलाने वालों के अच्‍छे-बुरे होने होने पर ही निर्भर नहीं करता अपितु उस विशिष्‍ट तंत्र पर भी निर्भर करता है। संगोष्‍ठी के द्वितीय सत्र में रंजीत कुमार, कमिश्‍नर, जीएसटी ने विभिन्‍न स्‍लाइडों की मार्फत बताया कि आर्थिक-सामाजिक असमानता जितनी ज्‍यादा होगी, उतना ही हमारा समाज अंदर से खोखला होगा।  दिखाया कि बेहतर जीवन स्थितियों का सीधा संबंध आय के स्‍तर से नहीं होता अपितु अवसरों की समानता से होता है। असमानता के कारण अपराधों का बढ़ना और मानसिक रोगों का बढ़ना भी आपने साबित किया। उन्होनें अपने वयाख्‍यान में चेताया कि आज उतनी ही असमानता है जितनी कि दूसरे विश्‍वयुद्ध से ठीक पहले थी। श्री कुमार ने आश्‍चर्य जताया कि जिस देश में अरबपतियों – खरबपतियों की संख्‍या में तेजी से इजाफा हो रहा हो, वह कैसे समाजवादी हो सकता है। उन्होने समाज में समानता लाने के लिए कुछ बुनियादी उपाय भी सुझाये, जैसे – उत्‍तराधिकार कर का लगाया जाना, निजी क्षेत्र में आरक्षण लाया जाना और सरकारी ठेकों आदि में आरक्षण की व्‍यवस्‍था लाना इत््यादि । उन्होनें यह भी कहा कि तमाम प्रकार की स्‍वतंत्रता हमें खुद कमानी पड़ती है। आज के अंक में पढ़िए…मोतिहारी की प्रसिद्ध स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ Dr. Rupam Kumari
…..संगोष्ठी के अंतिम वक्‍ता के रूप में पटना उच्‍च न्‍यायालय के अधिवक्‍ता विशाल जी ने कहा कि हमारे देश में न्‍याय और विकास कागजों पर तो बहुत गंभीर नज़र आता है किंतु व्‍यवहार में हम सिफ़र होते हैं। इतना ही नहीं संविधान के नीति निर्देशक तत्‍व होने के बाद भी हम गरीब तबकों को कानूनी सहायता मुहैय्या नहीं करा पाएं हैं।  इसके साथ ही एडवोकेट विशाल ने बेरोजगारी की विभिन्न रूपों यथा छिपी हुई बेरोजगारी और मौसमी बेरोजगारी के मुद्दे भी मुखरता से उठाया।  श्री विशाल यहीं नहीं रुके उन्होंने भंवरी देवी और विशाखा के मामलों के द्वारा भी भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में  स्‍त्री पर होने वाले पुंरूषवादी अत्‍याचारों को सामने रखा। संगोष्‍ठी के आरंभ में सामाजिक विज्ञान संकाय की अधिष्‍ठाता डॉ. सरिता तिवारी ने विश्‍वविद्यालय की तरफ से सभी आगंतुक अतिथियों का सम्‍मान किया। विश्‍वविद्यालय के विभिन्‍न शिक्षकों द्वारा शॉल ओढ़ाकर और पुष्‍पगुच्‍छ भेंट करके अतिथियों का सम्‍मान किया गया। संगोष्‍ठी के अंत में मानविकी एवं भाषा संकाय के अधिष्‍ठाता डॉ. प्रमोद मीणा ने धन्‍यवाद ज्ञापित करते हुए इस बात की आवश्‍यकता रेखांकित की कि हमारे विश्‍वविद्यालयों को विशेषाधिकार प्राप्‍त वर्गों के हितों का संरक्षण करने वाले वर्चस्‍वशील विचारों की कैद से आजाद करना होगा, तभी हम गाँधी जी के अंतिम व्‍यक्ति तक पहुँच पायेंगे। संगोष्‍ठी के दौरान विभिन्‍न विभागों के शिक्षक और विद्यार्थी उपस्थिति रहें। 

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