हनुमान जी दलित थे यह उतना प्रासंगिक नहीं है जितना कि उनका समाज के प्रति निस्वार्थ सेवक होना।

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नकुल कुमार        www.ntcnewsmedia.com

लोकतंत्र मैं सत्ता का हस्तांतरण हमेशा होते रहना चाहिए किसी एक पार्टी को अथवा किसी एक व्यक्ति को हमेशा मौका नहीं दिया जाना चाहिए। क्योंकि इससे निरंकुशता का भय अक्सर बना रहता है। कुछ केसो में काम भी होता है लेकिन क्रिएटिविटी नहीं हो पाती है। बदलाव के इस दौर में जनता सब कुछ देख रही है समझ रही है एवं दिन प्रतिदिन टीवी रेडियो आदि पर हो रहे विश्लेषण का अपने स्तर से विश्लेषण भी कर रही है।

इस परिस्थिति में अगर नेता चाहे की हम मंदिर मस्जिद के नाम पर लड़ा कर हनुमान जी को दलित बताकर जनता को बरगला कर उसका वोट लेकर सत्ता में आ जाएंगे तो इसे मुंगेरीलाल का सपना ही कहा जाएगा।

हनुमान जी दलित थे अथवा नहीं क्या डिबेट का विषय नहीं है अपितु हनुमान जी ने अपने जीवन में जितना त्याग किया जितना सेवा भाव से अपने प्रभु राम की माता सीता की भजन लक्ष्मण की एवं किष्किंधा नरेश एवं अपने मित्र सुग्रीव की सेवा की उससे नेताओं को काफी कुछ सीखने चाहिए क्योंकि यदि सेवा भाव से काम करने वाला व्यक्ति दलित है तो समाज का हर व्यक्ति दलित करना पसंद करेगा जिसने पूरी इमानदारी से सेवा भाव से अपने मालिक की सेवा की है।

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आज के समय में नेता हजारों लाखों रुपए खर्च करके राजनेता बनते हैं एवं उसके बाद खुद को कुबेर पति मानने लगते हैं जिससे वे जनता का काम करने की वजह चुनाव जीतने के हथ कंडो पर विचार करने लगते हैं चुनाव जीतने के साथ ही अगले चुनाव की तैयारी शुरू हो जाती है तैयारी करना अच्छी बात है लेकिन सिर्फ कुर्सी बचाने के लिए राजनीति के नीचे से नीचे स्तर तक पहुंच जाना या किसी भी दृष्टिकोण से अच्छा नहीं है।

आज पढ़ी-लिखी जनता काफी होशियार है सचेत है क्योंकि नेताओं ने ठगी करके गरीब जनता को होशियार बना दिया है एवं आज की जनता मांस दारू पर बिकने वाली नहीं है बल्कि अपने अधिकारों के लिए फेसबुक व्हाट्सएप से लेकर रोड तक क्रांतिकारी लड़ाई लड़ने के मूड में हैं यही कारण है कि अब हजारों की संख्या में लोग नोटा बटन का प्रयोग कर रहे हैं एवं भविष्य में राइट ऑफ रिकॉल की भी मांग उठेगी ताकि अपने पद बचाने के लिए नहीं बल्कि जनता के इतने ही नेता काम कर सके।

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