हिलोर मेरे मन की : धर्मेन्द्र

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कहाँ चले गए दोस्त!

कहाँ चले गए दोस्त!
बड़े होके तुम?
मशगूल हो गए
रोटी दाल की व्यवस्था में
खेले, पढ़े, बढ़े
उम्र के साथ साथ चले
तुम बड़े हो गए…
मेरा बचपना
मेरे भीतर छोड़कर
अपनी दिशा
भागदौड़ की ज़िंदगी की ओर
मोड़कर
कहाँ चले गए दोस्त!
तुम कहाँ चले गए?
जीता हूँ
ज़िंदगी को बड़ी जिंदादिली से,
खोजता हूँ
फिर भी…
पाता भी हूँ
लेकिन नहीं पाता हूँ
तुम्हे वही,
जब कि माया के सिवा
है कुछ नहीं.
अरे! अरे! अरे! वो माया नहीं
जिसके तुम दीवाने थे.
हम तो तब भी बेगाने थे
अब भी बेगाने हैं
तुम!
तुम कहाँ चले गए दोस्त!

: बस यूँ एक पन से दूसरे पन की व्यस्तता में खोयी कुछ यादों को समेट कर

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जयहिन्द
सत्यमेव जयते
Dharmendra KR Singh
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