सेवा सप्ताह के अवसर पर प्लास्टिक वस्तुओं के उपयोग की समाप्ति जल संरक्षण तथा संवर्धन पर सेमिनार का आयोजन

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मोतिहारी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्म दिवस के उपलक्ष्य में निर्धारित सेवा सप्ताह के अवसर पर आज डॉ. श्री कृष्ण सिन्हा महिला महाविद्यालय, मोतिहारी में प्लास्टिक वस्तुओं के उपयोग की समाप्ति, जल संरक्षण तथा संवर्धन पर आयोजित सेमिनार को सांसद सह पूर्व कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री राधामोहन सिंह ने संबोधित किया और शपथ भी दिलाई।

आयोजित सेमिनार को संबोधित करते हुए श्री सिंह जी ने कहा कि प्लास्टिक से होने वाली समस्या समय के साथ गंभीर होती जा रही है। आप सब लोग तो अच्छी तरह जानते हैं कि कैसे प्लास्टिक पशुओं की मौत का कारण बन रही है। इसी तरह नदियां, झीलों, तालाबों में रहने वाले प्राणियों का वहां की मछलियों का प्लाास्टिक को निगलने के बाद जिंदा बचना मुश्किल हो जाता है। इसलिए अब हमें सिंगल यूज प्लास्टिक यानी ऐसी प्लास्टिक जिसको एक बार उपयोग करके हम फेंक देते हैं उससे छुटकारा पाना ही होगा। हमें ये कोशिश करनी है कि इस वर्ष 2 अक्तूबर तक अपने घरों को, अपने दफ्तरों को, अपने कार्यक्षेत्रों को सिंगल यूज प्लास्टिक से मुक्त करें।

उन्होंने कहा कि भारत में सदियों से हमने सदैव जमीन को विशेष अहमियत दी है। भारतीय संस्कृति में पृथ्वी को अत्यंत पावन माना जाता है और इसकी आराधना मां के रूप में की जाती है।
प्रात: उठते समय जब हम अपने पैरों से धरती को छूते हैं तो हम प्रार्थना करके धरती माता से क्षमा याचना करते हैं।

श्री सिंह ने कहा कि जलवायु और पर्यावरण दरअसल जैव विविधता एवं भूमि दोनों को ही प्रभावित करते हैं। यह व्यापक रूप से स्वीकार किया जा रहा है कि दुनिया जलवायु परिवर्तन के नकारात्मक प्रभावों का सामना कर रही है।

सतत विकास के लिए भूमि की उर्वरता को बहाल करना आवश्यक है। आज मुझे भारत के उन सूचकांकों की याद दिलाई गई जो यूएनएफसीसीसी की पेरिस कॉप में प्रस्तुत किए गए थे।
इसने भूमि, जल, वायु, वृक्षों और सभी जीवित प्राणियों के बीच स्वस्थ संतुलन बनाए रखने संबंधी भारत की गहरी सांस्कृतिक जड़ों पर प्रकाश डाला। मित्रों, यह जानकर आपको खुशी होगी कि भारत अपना समग्र वृक्ष क्षेत्र बढ़ाने में सफल रहा है। वर्ष 2015 और वर्ष 2017 के बीच भारत के समग्र वृक्ष एवं वन क्षेत्र में 0.8 मिलियन हेक्टेयर की वृद्धि हुई थी।

श्री सिंह ने कहा कि स्वच्छता ही सेवा अभियान के साथ ही कुछ परिवर्तन हमें अपनी आदतों में भी करने होंगे। हमें ये तय करना है कि हम जब भी दुकान में, बाजार में, सब्जी लेने के लिए, कुछ भी खरीदारी करने के लिए जाएं तो साथ में अपना झोला, थैला, बैग जरूर लेकर के जाएं। कपड़े का हो, जूट का हो अवश्य ले जाएं। पैकिंग के लिए दुकानदार प्लास्टिक का उपयोग कम से कम करें, ये भी हमें सुनिश्चित करना होगा। मैं तो इसके भी पक्ष में हूं कि सरकारी दफ्तरों में, सरकारी कार्यक्रमों में भी प्लास्टिक की बोतलों की बजाए metal या मिट्टी के बर्तनों की व्यावस्था हो।

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जब पर्यावरण साफ रहता है। आस-पास गंदगी नहीं रहती तो इसका सीधा और सकारात्मक असर स्वास्थ्य पर भी दिखाई देता है।
पर्यावरण और स्वास्थ्य से ही जुड़ा एक और विषय है जलसंकट और जलसंकट का उपाय है जल जीवन मिशन। इस मिशन के तहत जल संरक्षण और हर घर जल पहुंचाने पर बल दिया जा रहा है। जल जीवन मिशन का बहुत बड़ा लाभ हमारे गांव में रहने वाले लोगों को मिलेगा, किसानों को मिलेगा और सबसे बड़ी बात हमारी माताओं, बहनों को सुविधा मिलेगी। पानी पर खर्च कम होने का सीधा सा मतलब है कि उनकी बचत भी बढ़ेगी।

भाइयो-बहनो, आजादी के 70 साल हो गए। बहुत सारे काम सब सरकारों ने अपने-अपने तरीके से किए हैं। सरकार किसी भी दल की क्यों न हो, केंद्र की हो, राज्य की हो, हर किसी ने अपने-अपने तरीके से प्रयास किए हैं। लेकिन यह भी सच्चाई है कि आज हिन्दुस्तान में करीब-करीब आधे घर ऐसे हैं, जिन घरों में पीने का पानी उपलब्ध नहीं है। उनको पीने का पानी प्राप्त करने के लिए मशक्कत करनी पड़ती है। माताओं-बहनों को सिर पर बोझ उठा करके, मटके लेकर दो-दो, तीन-तीन, पांच-पांच किलोमीटर जाना पड़ता है। जीवन का बहुत सारा हिस्सा सिर्फ पानी में खप जाता है और इसलिए इस सरकार ने एक विशेष काम की तरफ बल देने का निर्णय लिया है और वह है – हमारे हर घर में जल कैसे पहुंचे? हर घर को जल कैसे मिले? पीने का शुद्ध पानी कैसे मिले? हम आने वाले दिनों में जल-जीवन मिशन को आगे ले करके बढ़ेंगे। यह जल-जीवन मिशन, इसके लिए केंद्र और राज्यं सरकार साथ मिलकर काम करेंगे और आने वाले वर्षों में साढ़े तीन लाख करोड़ रुपये से भी ज्यादा रकम इस जल-जीवन मिशन के लिए खर्च करने का मोदी सरकार ने संकल्प लिया है।

बुद्धि सागर जी महाराज ने 100 साल पहले लिखा है कि एक दिन ऐसा आएगा, जब पानी किराने की दुकान में बिकेगा। आप कल्पना कर सकते हैं 100 साल पहले एक संत लिख कर गए कि पानी किराने की दुकान में बिकेगा और आज हम पीने का पानी किराने की दुकान से लेते हैं। हम कहां से कहां पहुंच गए।

उन्होंने कहा कि हमें थकना है, न हमें थमना है, न हमें रूकना है और न हमें आगे बढ़ने से हिचकिचाना है। यह अभियान सरकारी नहीं बनना चाहिए। जल संचय का यह अभियान, जैसे स्वच्छता का अभियान चला था, जन सामान्य का अभियान बनना चाहिए। जन सामान्य के आदर्शों को लेकर, जन सामान्य की अपेक्षाओं को लेकर, जन सामान्य के सामर्थ्य को लेकर हमें आगे बढ़ना है।

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