संयुक्त किसान मोर्चा बिहार के तत्वाधान में बैठक सह विचार गोष्ठी समपन्न

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पटना। संयुक्त किसान मोर्चा बिहार के तत्वाधान में बैठक सह विचार गोष्ठी का आयोजन किसान कॉटेज सी-ब्लॉक विधायक आवास दरोगा प्रसाद राय पथ पटना में संपन्न हुआ। जिसमें 26, 27 अगस्त को राष्ट्रीय कन्वेंशन में प्रस्ताव पारित के आलोक में 27 सितम्बर को भारत बंद सफल बनाने के लिए सर्वसम्मति से तय किया गया की पूरे बिहार में अपने आंदोलन को तेज किया जाए ओर सभी किसान मज़दूर कामगार मेहनतकश लोगों को गोलबंद करते हुए 27 सितम्बर 2021 को पूरे देश में एकदिवसीय भारत बंद की अपील की जाए ।
पूरे प्रदेश में सभी किसानो से हर ज़िले में संयुक्त किसान मोर्चा का निर्माण करना एवं सहायक संगठनो के साथ ज़िलों में रैलियों एवं विधान सभा स्तर पर किसान जन संसद का आयोजन कर तमाम ग्रामीण किसानो एवं शहरी मज़दूर को भी एकजुट किया जाए ।
इसकी अध्यक्षता किसान नेता चंद्रसेखर प्रसाद ने की । बैठक में विचार रखने वालों में सर्वश्री रामचंद्र आज़ाद, अनिल सिंह, राहुल किशोर, मनीष रंजन, अरुण सिन्हा, कल्लू सिंह, जयनेंद्र कुमार, वी वी सिंह इतयदि ने अपने विचार रखे।
किसान नेता जवाहर निराला ने कहा की किसान आंदोलन किसान मज़दूर को बचाने का ही नहीं लोकतंत्र संविधान बचाने का आंदोलन है।जिस तरह से देश की महापंचायत संसद में ध्वनि मत से इस काला कृषि क़ानून को पास कराकर केंद्र सरकार भाजपा नित लोकतंत्र का गला घोटा है ।
उन्होंने कहा कि किसान आन्दोलन के पिछले 10 महीनों के तजुर्बे से यह बात साफ हो गई है कि खेती के नाम से लाए गए तीनों कानून और नया बिजली बिल देशी-विदेशी कारपोरेट घरानों अर्थात बड़े पूंजीपतियों के हित-स्वार्थ में बनाए गए हैं।
कहा कि असल में, ये कानून किसानों के हाथ से उनकी जमीन और उपज दोनों छीनने के काले कानून हैं। इससे खेती में प्राइवेट कंपनियों, जमाखोरों व कालाबाजारियों का सम्पूर्ण नियंत्रण कायम हो जाएगा। यदि ऐसा होता है तो इन कानूनो का सबसे ज्यादा खामियाजा-नुकसान बेजमीन ग्रामीण व शहरी गरीबों को भुगतना पड़ेगा। सारे अनाज, दालें, आलू – प्याज आदि सब्जियां, तिलहन व सरसों के तेल समेत आवश्यक चीजों के दामों में बेतहाशा वृद्धि हो जाएगी। पीले व गुलाबी कार्ड पर राशन मिलना बंद हो जाएगा। जैसे, सरसों का तेल एक ही झटके में बंद कर दिया गया है। पेट्रोल-डीजल व रसोई गैस के दाम बड़ी तेजी से बढ़ाये जा रहे है।
श्री निराला ने कहा कि साथ ही, बेरोजगारी भी बढ़ेगी। प्राइवेट कंपनियों के साथ खेती में बड़ी मशीन व तकनीक आने से खेत मजदूरों को मजदूरी नहीं मिलेगी। कम्पनियां खेतों के नजदीक भी नहीं फटकने देंगी। पशु चारा के लिए घास खोदने, इंधन इकट्ठा करने के लाले पड़ जायेंगे। भैंस, गाय, भेड़-बकरी आदि पशु चराने के लिए चारागाह, यहां तक कि बंजड़ भूमि भी नहीं बच पायेगी। खेती के लिए ठेके पर जमीन नहीं मिलेगी। सरकारी अनाज मंडियां समाप्त होने से प्राइवेट मंडियों में मजदूरी के न्यूनतम रेट भी नहीं मिलेंगे, 8 घंटे का कार्य दिवस व यूनियन बनाने का अधिकार नहीं रहेगा। गरीबी, कंगाली बढ़ने से देहात में मकान चिनाई के काम ठप्प हो जाएंगे। लकड़ी व लोहे के जंगले, चौखट आदि सामान और मिट्टी के बर्तन बनाने के बचे खुचे काम भी समाप्त हो जाएंगे। चौतरफा मुनाफाखोरी का माहौल फैलने से सामाजिक सरोकार व मेलजोल समाप्त हो जायेगा। आपसी पारिवारिक रिश्तों पर भी स्वार्थ हावी हो जाएगा।
उन्होंने कहा कि ध्यान रहे, एक वक्त उद्योग, फैक्ट्री, कारखानों और यहां तक कि सरकारी क्षेत्र में जो थोड़ी-बहुत नौकरियाँ मिलती थी, वे पहले ही करीब-करीब मिलनी बंद हो चुकी हैं। उल्टे, नौकरियों से निकाला जा रहा है। नई भर्ती बंद हैं। खेती – किसानी पर टिकी चरमराती ग्रामीण अर्थव्यवस्था पूरी तरह से ध्वस्त हो जाएगी।
किसान नेता के अनुसार देश में कायम पूंजीवादी व्यवस्था ने पहले ही हर जाति, धर्म, भाषा, इलाका के लोगों को गरीब व अमीर में बाट दिया है। हर धर्म-जाति के ज्यादातर लोग गरीब हैं। बड़े अमीर अपनी ही जाति-धर्म के गरीबों से कभी का मुंह मोड़ चुके हैं। आजादी के इन 74 – 75 सालों में यही हुआ है और तेजी से हो रहा है। यह भी जगजाहिर है कि जात-पात-धर्म-इलाका की बातें पूंजीपतियों की सेवादार पार्टियां सिर्फ वोट बटोरने के लिए गरीबों में फूट डालने, उन्हें बाट कर रखने, उनमें आपस में झगड़े-फसाद, नफरत-द्वेष व अविश्वास पैदा करने के लिए की जाती हैं। गरीबों को न रोजगार मिलता है, ना इलाज है, ना ही सम्मान है। बच्चों को पढ़ाई नहीं, रोजगार नहीं, उनके विवाह, रिश्ते मिलना भी मुश्किल हो गया है।
इसलिए, तमाम देहाती व शहरी गरीबों को अपना जीवन बचाने के लिए एकजुट होकर पूंजीपतियों व उनकी बनाई सरकारों के काले कानूनों का मुंहतोड़ जवाब देना होगा। किसान कई महीनों से लड़ रहे हैं। देश की 10 बड़ी केन्द्रीय ट्रेड यूनियनों अर्थात श्रमिकों का समर्थन किसानों के साथ है। विद्यार्थी, नौजवान, महिलाएं, बुद्धिजीवी, यहां तक कि सरकारी व गैर सरकारी कर्मचारी भी किसानों के साथ हैं।
सरकार नया बिजली कानून बना कर बिजली उत्पादन से लेकर दाम वसूलने तक बिजली क्षेत्र के पूरे कारोबार को मुनाफाखोर-लुटेरी प्राइवेट कम्पनियों के हाथ में देना चाहती है। ऐसा होने पर गरीब बिजली से वंचित हो जांयेंगे। मंहगी बिजली से मध्यमवर्ग के परिवारों पर भी भारी आर्थिक बोझ पड़ेगा। एफडीआई, नोटबन्दी, जीएसटी जैसी सरकारी कुनीतियों से बर्बाद हो रहे दुकानदारों और छोटे व्यापारियों, कारोबारियों का समर्थन भी किसान आन्दोलन के साथ है।
इसलिए, मौजूदा किसान आंदोलन जनता का एक व्यापक जन आन्दोलन बन गया है। हम तमाम ग्रामीण व शहरी गरीबों से 27 सितम्बर के भारत बंद को शानदार ढ़ंग से सफल बनाने की अपील करते हैं ताकि सरकार के खतरनाक मंसूबों को रोका जा सके और अपना जीवन बेहतर बनाने का संघर्ष ताकतवर बनाया जा सके।

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