संडे स्पेशल में पढ़िए …..पटना की लोक संगीत गायिका मनीषा श्रीवास्तव की चंपारण यात्रा संस्मरण

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नमन वंदन चंपारण की धरती को जिसने मोहनदास करमचंद गांधी को महात्मा गांधी और बापू बनाया, इस पावन धरती पर आने का और गांधीजी पर गीतों को प्रस्तुत करने अवसर मिला यह मेरे लिए सौभाग्य की बात है। पहले चंपारण के बारे में, चंपारण सत्याग्रह के बारे में और गांधीजी के बारे में सिर्फ किताबों में ही पढ़े थे, आज उन सभी चीजों को साक्षात् देखकर बहुत प्रसन्नता हो रही है। उक्त बातें मशहूर गायिका मनीषा श्रीवास्तव ने NTC NEWS MEDIA के साथ साझा की।

सुश्री मनीषा ने अपनी चंपारण यात्रा का यात्रा वृतांत लिखते हुए बताती हैं कि उनके यात्रा का पहला दिन यानी कि 2 अक्टूबर को सुबह हजारीमल धर्मशाला में कार्यक्रम करने के बाद उनका काफिला भारत के प्रथम बुनियादी विद्यालय राजकीय बुनियादी विद्यालय वृंदावन आश्रम पहुंचा जहां उन्होंने अपनी प्रस्तुति दी एवं उनको यह बात जानकर अति प्रसन्नता हुई कि यह वैसा बुनियादी विद्यालय है जहां पर महात्मा गांधी एवं कस्तूरबा गांधी ने स्वयं ही पढ़ाया था इसके साथ ही साथ उन्होंने वहां पहली बार नील का पौधा देखा।

लोक गायिका मनीषा 120 दिवसीय कार्यक्रम के जिस काफिले के साथ थी वह काफिला अपनी यात्रा के दूसरे दिन पूर्वी चंपारण के चिरैया प्रखंड के मधुबनी आश्रम पहुंचा। इस आश्रम के विषय में कहा जाता है कि चम्पारण सत्याग्रह के दौरान महात्मा गांधी का प्रवास इसी आश्रम में हुआ था।

मधुबनी आश्रम के विषय में सुश्री मनीषा लिखती हैं कि ‘मैंने वहां चरखा के साथ गांधी जी की स्थापित मूर्ति को प्रणाम किया। इतना ही नहीं मैंने मैं सूत कातने का यंत्र देखा और स्वयं चलाया भी।

लगभग 20 प्रकार के गांधी जी पर आधारित गीतों को लेकर मैं गांधीजी को घर-घर गांव-गांव में खोजने निकली हूं इस संस्मरण को साझा करते हुए मुझे बेहद खुशी हो रहे हैं।

कल शाम यानी 4 अक्टूबर को फेनहरा गांव स्थित कस्तूरबा गांधी विद्यालय में शाम की प्रस्तुति दी और आज यानी 5 अक्टूबर को मधुबन सेंट्रल स्कूल के बाद अब मोतीपुर में कार्यक्रम में प्रस्तुति दिया।

सुश्री मनीषा श्रीवास्तव लिखती है कि मैंने विशेष रूप से लोकगीत में गांधी के विषय में पढ़ा कि जब गांधी जी ने चंपारण सत्याग्रह किया था तो उसका सबसे बड़ा प्रभाव वहां के लोगों पर पड़ा।

जहां स्त्रियों ने लोकगीतों में गांधी को दूल्हा बनाया तो वहीं सरकार को दुल्हन। दूसरी ओर चंपारण सत्याग्रह के समय स्त्रियां अपने पतियों को जमीदारी प्रथा से मुक्त होने के लिए और श्रम रोजगार के लिए प्रेरित करती थी उस पर भी आधारित गीत मैंने प्रस्तुत किया। ….सैया बोअ ना कापास….हम चलाईव चरखा….। उसके बाद फिरंगीया गीत प्रस्तुत किए जिसमें अंग्रेजों के शासन के समय भारत के बिगड़ते हुए स्थिति को वर्णन किया। इसके आगे भी गांधीजी पर कई आयोजन अलग अलग अलग जगहों पर आयोजित किया गया है जिसमें प्रस्तुति दूंगी।

फिलहाल मैं इतना ही कहना चाहूंगी कि चंपारण की धरती पर आकर मैं धन्य हूं यहां के लोगों ने जो प्यार दिया जो मान दिया जो सम्मान दिया वह मेरे लिए बहुत अनमोल है। मैंने कभी सोचा नहीं था कि गांधी जी में मेरी इतनी रुचि कभी हो पाएगी। दिन प्रतिदिन गांधी को जानने की उत्सुकता बढ़ती ही जा रही हैं ।मैंने अपने जीवन में अब तक के सबसे बेहतर आयोजन में भाग ले रही हूं यही सोचकर मैं बहुत प्रसन्न हूँ।

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