युवाओं के विभिन्न समस्याओं को उठाने वाले अनिकेत पाण्डेय को 2058 ही मत क्यों मिला…? एक समीक्षा।

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पूर्वी चम्पारण। छात्रों/युवाओं की समस्याओं को लेकर हमेशा सड़क पर आंदोलन करने वाले युवा समाजसेवी अनिकेत पांडे उर्फ अनिकेत रंजन को सिर्फ 2058 वोट प्राप्त हुआ।। अर्थात लोकसभा चुनाव में करारी हार ने आगे की राजनीतिक जीवन के लिए बहुत ही बड़ी समीक्षा का अवसर दिया है कि सिर्फ लोगों की सहायता करना ही काफी नहीं है बल्कि जिन लोगों की आंख सहायता कर रहे हैं उनका मत आपके लिए कन्वर्ट हो इस योग्य स्वयं को प्रतिस्थापित करना भी जरूरी है।

जब इसकी समीक्षा की जाती है कि आखिर अनिकेत रंजन को वर्षों से मोतिहारी में की गई समाज सेवा का प्रतिफल स्वरूप 2058 वोट ही मिले तो यहां बहुत कुछ देखने व समझने को सामने आता है। आइए कुछ हम समझते हैं कुछ आप भी समझिए

मोदी लहर थी अथवा मोदी की सुनामी अथवा मोदी अंडर करंट….. समीक्षक इसकी समीक्षा कर रहे हैं और अगले 5 साल तक इसकी समीक्षा करते रहेंगे क्योंकि जिस तरह से साइलेंट वोटर्स ने अपना मत टोकरी में भरकर मोदी जी को दिया है। वास्तव में समीक्षा का विषय है एवं मोदी के विरोधियों के लिए जनता के मनोभाव को टटोलने का एक अवसर भी है।

अब पूर्वी चंपारण लोकसभा क्षेत्र के संदर्भ में अंकित पांडे को लेकर हमारी बातचीत आप से हो रही थी की हर समय छात्रों की समस्याओं को लेकर सड़कों पर आने वाले इस युवा समाजसेवी अनिकेत पांडे को जनता ने या यूं कहें कि युवा साथियों ने मात्र 2058 वोट ही क्यों दिया…?

बालाकोट एयर स्ट्राइक के बाद राजनीतिक समीकरण का भी बदल गए थे एवं अभिनंदन की वापसी ने देश में जिस तरह से राष्ट्रवाद का संचार किया उसके बाद मोदी जी के भाषण ओं ने उसको सिंचित किया कि फिर एक बार मोदी सरकार।

पूर्वी चंपारण के संदर्भ में अनिकेत पांडे को 2058 वोट मिलने का भी यही कारण है। जिन युवाओं की समस्याओं के लिए अंकित पांडे हमेशा सड़कों पर हैं निश्चित रूप से उन युवाओं में कुछ ने उनको वोट दिया होगा किंतु चुनाव के दौरान जिस तरह से राष्ट्रवाद मुद्दा बना रहा, स्वच्छता अभियान के तहत शौचालय का बनना जन धन योजना के तहत अकाउंट का खुलना स्किल इंडिया प्रोग्राम स्टार्टअप इंडिया प्रोग्राम गांव में छोटे-छोटे बैंकों का खुलना एवं जिओ की इंटरनेट क्रांति में राष्ट्रीय स्तर की सभी घटनाक्रमों का सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुंच ने लोगों को मोदी से जुड़े रखा और इसी जुड़ाव को क्षेत्रीय स्तर के नेता छोड़ने में असफल रहे, अंकित पांडे की करारी हार में उपरोक्त कारणों को रखा जा सकता है।

दूसरी ओर अंकित पांडे के मतों को जब ध्यान से देखा जाता है तो इनका मत नोटा से लगभग 10 गुना कम है अर्थात लोगों का उम्मीदवारों की प्रति अनआस्था अंकित पांडे को वोट देने की वनस्पति ज्यादा थी। अनिकेत पांडे ने अपने पूर्वी चंपारण के क्षेत्र में “चलो गांव की ओर” कार्यक्रम के माध्यम से खुद को ग्रामीण परिवेश से जोड़ने की भरपूर कोशिश की थी किंतु यह जुड़ाव वोट में कन्वर्ट नहीं हो सका।

अपने दिए मैसेज में सन ऑफ किसान अनिकेत पांडे ने कहा कि 16 साल की उम्र से ही मैंने अपनी राजनीतिक और सामाजिक जीवन की शुरुआत की थी। उसके बाद मंजूर दर्जनों f.i.r. हुए।

उन्होंने कहा कि मैं इन सबके बावजूद लोगों के कार्यों के लिए, किसानों के अधिकार के लिए, जिले में बिजली में सुधार के लिए, ट्रांसफार्मर लगवाने के लिए, गांव-गांव में जो स्वास्थ्य केंद्र बने हैं उसको चालू करवाने के लिए, बहुत सारे कार्यों के लिए हुए हमने लड़ा।

इतना ही नहीं आगे उन्होंने कहा कि सदर अस्पताल को सुधारने का काम, आईसीयू लगवाना एवं उसमें बच्चा वाला एसएनसीयू उसका भी वेंटिलेटर, दवाई के लिए, उसके बाद जननी सुरक्षा योजना में गड़बड-झाला का पर्दाफाश करना,एक महिला 1 महीने में तीन तीन बच्चों को जन्म दे रही थी उसका पर्दाफाश करना शामिल है।

चाहे प्राइवेट स्कूलों में रीएडमिशन का मामला हो अथवा चाँदमारी मोहल्ले में लड़कियों से छेड़खानी का मामला,सीसीटीवी कैमरा लगवाने के लिए तमाम कार्य जो हमने की है उसमें सफलता भी पाई। इसके अलावा दर्जनों काम में सफलता पाई है। खैर जनता ने जो भी हमें सम्मान दिया उसको स्वीकार करते हैं उसके लिए उनको धन्यवाद भी देते हैं।

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अनिकेत पांडे काफी युवा हैं एवं किसी बड़ी ब्रांडेड पार्टी से नहीं जुड़े हैं यही कारण है कि अनिकेत पांडे को इतना मत प्राप्त नहीं हो सका लेकिन जब इंडिपेंडेंट कैंडिडेट पर नजर डालते हैं तो हम देखते हैं कि कई इंडिपेंडेंट कैंडिडेट ऐसे हैं जिनको अनिकेत पांडे से ज्यादा मत मिले हैं अर्थात यहां एक मैच्योर पॉलीटिशियन की कमी कहीं ना कहीं लोगों को महसूस हुई जिस कारण से लोगों ने 18 नंबर पर स्थित टेम्पो छाप को इग्नोर किया।।

 

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