भीमराव आंबेडकर/14.04.2017

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 नकुल कुमार/मोतिहारी
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                 महाड़ आंदोलन के प्रणेता, दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों की आवाज को बुलंद करने वाले, सदी के महानायक, महान विचारक, महान राजनीतिज्ञ एवं महान वकील श्री बाबा साहब भीमराव अंबेडकर की जयंती पर उन्हें शत् शत् नमन।
                भीमराव अंबेडकर ना सिर्फ राजनेता थे बल्कि वे एक समाज प्रतिष्ठित, जन जन के नेता थे। राजनेता सिर्फ एक पार्टी के होकर रह जाते हैं। लेकिन बाबा साहब भीमराव अंबेडकर एक पार्टी के नहीं, एक समूह के नहीं बल्कि दबे-कुचलों, पिछडो़ एवं सामाजिक रूप से शोषित वर्गों के मसीहा थे।
                जिस समय भारत में जात-पात, छुआ-छूत, ऊंच-नीच आदि भावना के आधार पर समाजिक ​रूप से बंटा हुआ था। भारत आजाद तो हो चुका था लेकिन समाज का एक वर्ग अब भी तथाकथित बड़जात्या वर्ग के आधीन रहकर मानसिक, शारीरिक व सामाजिक यातना झेल रहा था। समाज के जिस वर्ग को छोटी जाति का कहके समाज के सभी अधिकारों से वंचित रखा गया था। जिन्हें सड़क पर चलने का अधिकार नहीं था, जिन्हें बराबरी का अधिकार नहीं था जिन्हें अच्छा खाने, अच्छा पहनने, उठने-बैठने व संपत्ति का अधिकार नहीं था। वैसे समय में बाबा साहब भीमराव अंबेडकर का अभ्युदय उनके मसीहा के रूप में हुआ।
                उन्होंने ना सिर्फ उनके अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ी बल्कि स्वतंत्र भारत में ही तथाकथित बड़जात्या​ वर्ग के गुलामी से मुक्ति दिलाया । मानसिक गुलामी की बेड़ियां टूटी एवं सभी को बराबरी का हक मिला। यदि बाबा साहब भीमराव अंबेडकर ना होते तो निश्चित रूप से पिछड़ों, दलितों-आदिवासियों एवं सामाजिक रुप से पिछड़े लोगों को समाज में पढ़ने-लिखने, उठने-बैठने, खाने-पीने, आने-जाने एवं संपत्ति का अधिकार के साथ साथ बहुत सारे अधिकार जो आज प्राप्त हैं, उन्हें प्राप्त न होते । अगर भीमराव आंबेडकर न होते तो आज हमें यह संविधान प्राप्त न होता​। जहां तक आरक्षण की बात है तो यह आवश्यक तथ्य है जिसे कटु मन से ही सही स्वीकार करना ही होगा ।
                  बहुत सारे लोग आज आरक्षण हटाओ देश बचाओ का नारा दे रहें हैं, लेकिन वे संपत्ति की बराबरी की बात क्यों नहीं करते हैं…? आखिर देश में किसी के पास ज्यादा और किसी के पास कम जमीन क्यों है…?  कोई अधिक विलासिता में तो कोई दयनीय स्थिति में क्यों है…? कोई महल में है तो कोई फुटपाथ पर क्यों है…? पैसों वालों के बच्चें प्राईवेट संस्थानों में अच्छी शिक्षा ले रहे हैं जबकि गरीबों​ के बच्चें सरकारी में क्यों पढ़ रहें हैं…? सबके लिए समान शिक्षा की व्यवस्था क्यों नहीं है….? आखिर आरक्षण हटाओ का नारा देने वाले इस विषय पर एक मत क्यों नहीं होते हैं…..?
                  महाड़ आंदोलन से शुरू सामाजिक बराबरी की लड़ाई आज भी जारी है….. और तब तक जारी रहेगी जब तक सबको सामाजिक​ बराबरी का सिर्फ दर्जा ही नही बल्कि अधिकार प्राप्त न हो जाता। बराबरी से तात्पर्य अमीर हो या गरीब सबके बच्चें एक साथ सरकारी संस्थानों में पढ़ें, सबको एक जैसा रहन सहन प्राप्त हो। सबकी संपत्ति बराबर-बराबर​ हो। सबके पास बराबर-बराबर जमीन जायदाद हो । जबतक सबको बराबर सामाजिक, आर्थिक, राजनीति अधिकार प्राप्त न हों जाएं, तब तक अंबेडकर सबमें जीवित रहेंगे और संविधान सम्मत लड़ाई लगते रहेंगे।

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