प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान नेता जी सो रहे थे अथवा आंख बंद करके केंद्रीय मंत्री को गंभीरता से सुन रहे थे…??? पूरा विश्लेषण पढ़िए…!!!

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प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान नेता जी सो रहे थे अथवा आंख बंद करके केंद्रीय मंत्री को गंभीरता से सुन रहे थे…??? एक समीक्षा…!!!

                      नकुल कुमार / स्वतंत्र पत्रकार मुजफ्फरपुर। केंद्रीय मंत्री डॉ हर्षवर्धन के प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान केंद्रीय राज्य मंत्री अश्विनी चौबे की आंख बंद मुद्रा की मीडिया गलियारों में चर्चा का विषय बनी हुई है क्योंकि लगातार होती बच्चों की मौत कहीं ना कहीं मीडिया पर वास्तविक घटनाक्रम की लगातार रिपोर्टिंग करने का दबाव बनाए हुए हैं एवं मीडिया के माध्यम से सरकार पर, इस महामारी से बच्चों को बचाने एवं तत्क्षण रेस्क्यू के लिए दबाव बना हुआ है।

इतिहास के पन्नों में भारत के  भूत पूर्व उप प्रधानमंत्री एवं  भारतीय जनता पार्टी के भीष्म पितामह लालकृष्ण आडवाणी जी सदन में अथवा मंचों पर आंख बंद करके किसी चीज को गंभीरता से सुना करते थे। आज के परिवेश में  सांसद आरके सिंहा भी कार्यक्रमों के दौरान आंख बंद करके शांत चित्र मुद्रा से वक्ता की बातों को ध्यान से सुनते हैं, मुजफ्फरपुर में केंद्रीय मंत्री के प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान कि यह फोटो देखकर मुझे उसी सकारात्मक तथ्य की याद आ गई। लेकिन जैसे-जैसे न्यूज़ मंथन होते गया वैसे वैसे स्थितियां और मेरे उस दृश्य के सकारात्मकता का गांठ इस स्थिति के लिए ढीला होता गया कि वास्तव में प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान नेताजी केंद्रीय मंत्री की बात को गंभीरता से सुन रहे थे, मंथन कर रहे थे अथवा सो रहे थे….??? लेकिन अभी भी भरोसा नहीं हो रहा है की केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन के बगल में बैठ कर राज्य मंत्री सो रहे होंगे…!!!

यह सही बात है कि मोदी सरकार प्रचंड बहुमत से आई है लेकिन इसका यह कतई मतलब नहीं है कि हम सत्ता के मद में इतने चूर हो जाएं कि हमारे भीतर की संवेदनाएं धीरे-धीरे 0 की तरफ बढ़ जाए एवं हमारे सामने आस पड़ोस में रोते बिलखते लोगों की बातें हम पर असर करना बंद कर दे।

मुझे याद है चुनाव की विभिन्न बड़ी रैलियों के दौरान जब मैं न्यूज़ कवर कर रहा था उस समय दिल्ली से आए हुए बड़े नेता ने स्थानीय सांसद उम्मीदवार की ओर इशारा करके कहा था कि “आपको वोट सांसद महोदय को नहीं देना है बल्कि आप को वोट मोदी सरकार के लिए देना है।”

अब जब उपरोक्त कथन का विश्लेषण करते हैं तो हम पाते हैं कि लोग स्थानीय उम्मीदवारों से भले ही नाखुश थे लेकिन हीराबेन के पुत्र एवं आर एस एस के स्वयंसेवक गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी के प्रति लोगों के मन में भावनाएं थी जिस कारण से सारे के सारे उम्मीदवार हंड्रेड मार्क्स से पास हो गए।अब केंद्रीय सत्ता मैं बैठे हुए शक्ति संपन्न अथॉरिटी को इस बात पर विचार करना होगा कि जिनको वोट मोदी जी के नाम पर दिलाया गया है वह अपने क्षेत्रों में सजग हैं, जागरूक हैं एवं काम कर रहे हैं अथवा नहीं इस बात की लगातार मॉनिटरिंग करता रहे।

बिहार के मुजफ्फरपुर में लगातार हो रही बच्चों की मौत एवं साल दर साल इस मौत के कारणों का बदलता हुआ नाम कहीं ना कहीं इस बात की ओर इशारा करता है कि जितने जरूरी ढंग से इस चमकी बुखार अथवा एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम अथवा जापानी इंसेफेलाइटिस अथवा मस्तिक ज्वार अथवा नवका बीमारी पर काम करना चाहिए था उतना तेजी से इस पर काम नहीं हो सका। क्योंकि विगत 10 वर्षों से इस तरह की छिटपुट घटनाएं इतनी तेजी से विकराल रूप लेंगे इसका अंदाजा ना आम लोगों और था और ना ही उन सत्ता प्रतिष्ठानों को जो चुनाव में अपनी कुर्सी बचाने में अपनी सारी ऊर्जा खर्च कर दिए किंतु जनता भगवान भरोसे रह गई।सबसे बड़ी दिक्कत की बात यह है कि 140 करोड़ की आबादी वाले इस देश में क्या हमारे पास कोई ऐसा तंत्र नहीं है ऐसी कोई भी विपदा आए उस परिस्थिति में हम तत्क्षण डॉक्टरों की टीम के द्वारा तत्क्षण रेस्क्यू कर सकें। जैसे कि भारत के तटीय राज्यों के विभिन्न क्षेत्रों में आने वाले समुद्री साइक्लोन अथवा बाढ़ सुखाड़ या विभिन्न प्राकृतिक आपदाओं से उत्पन्न स्थितियों से निपटने के लिए NDRF की टीम हमेशा तैयार रहती है उसी तरह से उसी तर्ज पर विभिन्न तरह की अकस्मात बीमारियों से निपटने के लिए हमारे यहां डॉक्टरों की टीम भी NDRF की तरह मुस्तैद रहनी चाहिए।

अब जहां तक बात रही नेताजी की तो अब नेताजी ही या कंफर्म करेंगे कि वे आंख बंद करके केंद्रीय मंत्री की बात को गंभीरता से सुन रहे थे अथवा भगवान का ध्यान कर रहे थे अथवा बच्चे मर रहे हैं उस पर मंथन कर रहे थे या मीडिया की बातों को पुष्ट करेंगे कि वह सो रहे थे।

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