पाकिस्तानी प्रोपेगंडा के बीच प्रधानमंत्री मोदी की फ्रांस यात्रा एवं अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की समीक्षात्मक विश्लेषण

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मोतिहारी /नकुल कुमार साह

नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की फ्रांस यात्रा के सबसे यादगार लम्हों में से एक यह फोटो है।
रिश्तो में जितनी भावना, सहानुभूति एवं समरसता भरी हुई होती है रिश्ते उतना ही ज्यादा मजबूत होते हैं। एवं यही व्यक्तिगत विचारों से बनाए गए रिश्ते कश्मीर जैसे मुद्दे पर किसी भी तरह के भारत विरोधी निर्णय लेने से पहले एक बार सोचने का मौका देते हैं।
अंतरराष्ट्रीय मंच पर चीन और पाकिस्तान की घेराबंदी के बीच अमेरिका का चौधरी के रूप में प्रकट होना कहीं ना कहीं भारत के लिए सिरदर्द लम्हा से कम नहीं है किंतु इन सब के बीच स्थाई सदस्य फ्रांस का भारत और पाकिस्तान के द्विपक्षीय मुद्दे के बीच किसी तीसरे का टांग ना आने की सलाह देना कहीं ना कहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पूर्व विदेश यात्राओं का ही प्रतिफल है।
रसिया भारत का एवरग्रीन मित्र है किंतु ज्योहिं हथियार एवं टेक्नोलॉजी के मामले में भारत का झुकाव अमेरिका की तरफ हुआ तो रूस पाकिस्तान के साथ मिलकर कूटनीति चलने लगा जिसे दक्षिण भारत ने विभिन्न हथियार समझौतों के साथ नियंत्रित किया जिसमें अमेरिका के विरोध के बावजूद डिफेंस सिस्टम डील भी शामिल है।
जहां तक बात ब्रिटेन की चीज है तो ब्रिटेन शुरू से ही लूट मचाने वालों का गिरोह रहा है दूसरे देश के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करना एक को सहायता देकर दूसरे से लड़ा ना और फूट डालो शासन करो की नीति का अनुसरण करना या ब्रिटेन की पुरानी नीति रही है एवं उसका अनुसरण पैटर्न आज भी अपने टीवी चैनल रेडियो एवं विभिन्न माध्यमों से करता आया है। सुरक्षा परिषद का सदस्य होने के नाते भारत जैसे उसके पूर्व उपनिवेश व दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के प्रति जो श्रद्धा होनी चाहिए ब्रिटेन उसका पालन नहीं कर पाया। एवं कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान के साथ मिलकर जिस तरह से वह फ्रंटफुट पर खेल रहा है आने वाले दिनों में अगर मोदी सरकार देश हित में और भी कठोर निर्णय लेती है तो उसमें ब्रिटेन सहित तमाम बाहरी देशों की मिशनरी एक्टिविटीज पर अंकुश लगाना शामिल होगा इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है।
अब बात जहां तक चाइना की रही तो चाइना पाकिस्तान के गरीबी एवं कमजोरी का जबरदस्त फायदा उठा रहा है एवं जिस काम को ब्रिटेन रूस और अमेरिका नहीं कर पाए चाइना की नजर उस गिलगित बालटिस्तान एवं बलूचिस्तान के क्षेत्र पर है। सामरिक रूप से गिलगित बालटिस्तान क्षेत्र विश्व के 5 देशों से जुड़ा हुआ एवं दक्षिण एशिया का द्वार रूप में है जिससे फारस की खाड़ी से लेकर ब्रिटेन रूस चाइना तक सड़क मार्ग से जुड़ा जा सकता है और इसी पर चाइना की नजर है जिसके माध्यम से वह सड़क एवं रेल लाइनें बिछाकर पूरी दुनिया में व्यापार व्यवसाय कर सकता है।
कश्मीर मुद्दे पर भारत ने जो निर्णय लिया है यह निर्णय 21वीं सदी के उभरते हुए शक्तिशाली भारत के अदम्य साहस का प्रतीक है। कश्मीर से 370 एवं 35a समाप्त करने के साथ ही भारतीय सेना ने 1971 के पाकिस्तानी सेना की तरह गलतियां नहीं की। क्योंकि 1971 में बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के समय बांग्लादेश में भी मुस्लिम समुदाय के लोग थे किंतु पाकिस्तानी आर्मी द्वारा किए जा रहे नरसंहार एवं महिलाओं के साथ बलात्कार के कारण इतनी बड़ी फौज होते हुए भी 90000 सैनिकों को सरेंडर करना पड़ा एवं उसे अपनी एक जमीन खोनी पड़ी।
कश्मीर से धारा 370 एवं 35a समाप्त होने के साथ ही पाकिस्तान की अपनी सेना के साथ 1971 जैसा ही कुछ करने को तैयार है जिसमें ब्रिटेन एवं चाइना उसकी मदद कर रहे हैं किंतु इस समय केंद्र में पूर्ण बहुमत की एक शक्तिशाली सरकार है जिससे उसकी दाल नहीं गल पा रही है। पाकिस्तान जानता है क्या जिसके सरकार में भारतीय सेना पाकिस्तान के भूमि में घुसकर सर्जिकल स्ट्राइक कर सकती है बालाकोट में उसके आतंकी कैंप को उडा सकती है वह सेना भारतीय क्षेत्र में घुसने पर जोरदार जवाबी कार्रवाई कर सकती है जिससे पाकिस्तान को सिर्फ नुकसान ही नहीं होगा बल्कि उसे पाकिस्तान ऑक्यूपाइड कश्मीर के साथ-साथ बलूचिस्तान एवं गिरगिट बलिदान से भी हाथ ना धोना पड़ जाए।जम्मू कश्मीर को लेकर सरकार हर कदम फूंक-फूंककर रख रही है बरसों से आतंक से पीड़ित एवं अलगाववाद से त्रस्त घाटी के नौजवान भारतीय सेना के खिलाफ पत्थर फेंकते फेंकते भारत विरोध में अभ्यस्त हो चुके हैं जिसके कारण उन्हें फिर से मूल धारा में लाने में कुछ समय लग सकता है अपितु सभी ऐसे नहीं है वहां अमन पसंद लोग भी हैं जो चाहते हैं कि जम्मू कश्मीर में 1990 के पहले जैसी खुशियां ली आए लेकिन अब भारत के किसी प्रांत के लोग वहां जमीन खरीद लेंगे, स्थाई नागरिक बन जाएंगे फिर यहां भीड़ भाड़ हो जाएगी, कश्मीर की मूल संस्कृति लुप्त हो जाएगी जैसी उनकी अपनी चिंताएं हैं जोकि पाकिस्तान समर्थित टुकड़े-टुकड़े गैंग द्वारा साजिश के तहत उनके दिमाग में भरी गई है।यही कारण है कि मोदी सरकार जम्मू कश्मीर मामले को लेकर काफी संजीदगी से एक-एक कदम फूंक-फूंक कर बढ़ा रही है एवं दुनिया के देशों को यह बताने की कोशिश कर रही है कि कश्मीर मुद्दा भारत का आंतरिक मुद्दा है एवं पाकिस्तान अथवा कोई भी देश इसमें पक्षकार नहीं है।।फ्रांस के प्रधानमंत्री को फ्रांस की तरफ से कश्मीर भारत का द्विपक्षीय मुद्दा है जैसे आश्वासन मिलना मोदी सरकार की कूटनीति का ही परिणाम कहा जा सकता है एवं स्थाई सदस्यों के भारत के पक्ष में अपना पक्ष रखना भारत के लिए पूर्व में किए गए कूटनीतिक प्रयास का सार्थक परिणाम कहा जा सकता है।।

नोट: इस लेख में  स्वतंत्र पत्रकार नकुल कुमार  के अपने विचार हैं यह कोई जरूरी नहीं है कि NTC NEWS MEDIA  इससे सहमत ही हो।

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