डॉ हेना चंद्रा के “चंद्रा लाइफ लाइन हॉस्पिटल” में हुआ विचित्र बच्चे का जन्म

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मोतिहारी शहर की सुप्रसिद्ध स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉक्टर हेना चंद्रा के बेलवन में स्थित नर्सिंग होम में एक विचित्र या anencephalic बच्चे का जन्म हुआ है जिसकी मृत्यु जन्म के तुरंत बाद ही हो गई।नीरपुर के रहने वाले संतोष पांडे की पत्नी किरण देवी को 8 महीने का गर्भ था और पेट में दर्द की शिकायत के बाद मोतिहारी स्थित डॉक्टर चंद्रा नर्सिंग होम में एडमिट कराया गया जहां उन्होंने एक विचित्र बच्चे को जन्म दिया जिसका मस्तिष्क एवं शरीर का अन्य भाग पूरी तरह से डेवलप नहीं था और जन्म के तुरंत बाद ही इस बच्चे की मृत्यु हो गई।

इस विषय पर जब रिपोर्टर नकुल कुमार ने डॉक्टर हेना चंद्रा से बातचीत की तो उन्होंने बताया कि ऐसी स्थिति को anencephalic कहते हैं इस स्टेज में बच्चे का शरीर का कोई मेजर हिस्सा या मस्तिष्क या तो अनुपस्थित रहता है अथवा उसका डेवलपमेंट ठीक से नहीं हुआ रहता है। ऐसे बच्चे के जन्म के बाद उसके बचने का चांस लगभग शून्य होता है। ऐसे बच्चों के जन्म का कारण या तो अनुवांशिक होता है अथवा पोषक तत्वों की कमी से होती है।

यह पूछे जाने पर कि किसी प्रेग्नेंट स्त्री को कैसे मालूम चलेगा कि उसका बच्चा नॉर्मल है या एबनॉर्मल इसबात डॉक्टर चंद्रा ने बताया कि….. इसका सबसे आसान तरीका है अल्ट्रासाउंड। अल्ट्रासाउंड के द्वारा ही पता किया जा सकता है कि गर्भ की स्थिति कैसी है…? उस में पल रहा बच्चा कैसा है…? सीधा है, उल्टा है या उसका वास्तविक पोजीशन क्या है…?

आगे डॉक्टर चंद्रा कहती हैं कि प्रत्येक गर्भस्थ महिला को कम से कम तीन-चार बार अल्ट्रासाउंड अवश्य ही कराना चाहिए, ताकि बच्चे की वास्तविक स्थिति की जानकारी मिलती रहे एवं समय रहते उसका समुचित इलाज किया जा सके ।

गर्भवती स्त्री के लिए अल्ट्रासाउंड के विभिन्न स्टेज:-

  • प्रथम अल्ट्रासाउंड स्टेज( प्रेगनेंसी होते ही) –

जब आपको पता चला कि आप प्रेग्नेंट हैं उस समय अल्ट्रासाउंड कराना होता है ताकि पता चले कि सब कुछ सही पोजीशन पर है अथवा नहीं।

  • दूसरा अल्ट्रासाउंड स्टेज (18 से 20 वीक में )-

इसे लेवल 2 अल्ट्रासाउंड स्टेज भी कहा जाता है स्टेज में पता चलता है कि बच्चा का सारा और जन ठीक से काम कर रहा है अथवा नहीं सारा सिस्टम नॉर्मल है अथवा नहीं

  • तीसरा अल्ट्रासाउंड स्टेज (सातवें माह में):-

             इस स्टेज में अल्ट्रासाउंड के द्वारा पता चलता है कि गर्भ में जो बच्चा है उसका ग्रोथ कम तो नहीं है, गर्भ में पानी की कमी तो नहीं है ताकि समय रहते उसको मैनेज किया जा सके।

  • चौथा अल्ट्रासाउंड स्टेज (डिलीवरी अथवा लेबर पेन के समय):-

              चौथा एवं अंतिम अल्ट्रासाउंड लेबर पेन के समय कराया जाता है ताकि इस स्थिति में बच्चे का सही पोजीशन पता चल सके कि बच्चा सीधा है, आडे तिरछा है, उल्टा है या उसका एक्जेक्ट पोजीशन क्या है…?

           यह पूछे जाने पर कि बहुत बार मरीजों की शिकायत होती है कि डॉक्टर अल्ट्रासाउंड अपने फायदे के लिए कराते हैं……..इसपर डॉक्टर चंद्रा मुस्कराते हुए कहतीं हैं कि डॉक्टर सिर्फ डॉक्टर है भगवान नहीं । मरीज को क्या प्रॉब्लम है यह या तो डॉक्टर जानता है या फिर भगवान ही।
चुकि डॉक्टर ने उस विषय की पढ़ाई की है और कुछ उसके अपने अनुभव है जिसके आधार पर वह देखकर अथवा छूकर बहुत हद तक पता कर लेता है कि उसके पेशेंट को क्या प्रॉब्लम है किंतु जो पेशेंट है, जो प्रेग्नेंट महिला है उसको कैसे मालूम चलेगा कि उसको क्या प्रॉब्लम है उसके गर्भ में जो बच्चा है उसका एग्जैक्ट पोजीशन क्या है…? बच्चा सीधा है…? बच्चा टेढ़ा है…? बच्चा उल्टा है या बच्चे की सही स्थिति क्या है….? और इस बात की सही जानकारी मरीज को प्रमाणिक तौर पर अल्ट्रासाउंड के द्वारा ही दी जा सकती है।

                            अपने नर्सिंग होम में जन्मे इस विचित्र बच्चे के जन्म पर उन्होंने कहा कि इसतरह के केसेज को रेयरेस्ट कह सकते हैं। क्योंकि इस तरह के मामले काफी कम देखने को मिलते हैं ,जेनरल केसेज में नॉर्मल डिलीवरी होती है और जच्चा-बच्चा दोनों स्वस्थ होते हैं।।

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