कॉलेजियम व्यवस्था को भारतीय न्याय व्यवस्था में अभिशाप की तरह मानता हूं: माधव आनंद

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जिस व्यवस्था के तहत जजों की नियुक्ति की जाती है उसे कॉलेजियम व्यवस्था कहते हैं। सुप्रीम कोर्ट तथा हाईकोर्ट में जजों की नियुक्ति तथा तबादलों का फैसला भी कॉलेजियम ही करता है। इसके अलावा उच्च न्यायालय के कौन से जज पदोन्‍नत होकर सुप्रीम कोर्ट जाएंगे यह फैसला भी कॉलेजियम ही करता है।
कॉलेजियम वकीलों या जजों के नाम की सिफारिस केंद्र सरकार को भेजती है। इसी तरह केंद्र भी अपने कुछ प्रस्तावित नाम कॉलेजियम को भेजती है।
केंद्र के पास कॉलेजियम से आने वाले नामों की जांच/आपत्तियों की छानबीन की जाती है और रिपोर्ट वापस कॉलेजियम को भेजी जाती है, सरकार इसमें कुछ नाम अपनी ओर से सुझाती है। कॉलेजियम; केंद्र द्वारा सुझाव गए नए नामों और कॉलेजियम के नामों पर केंद्र की आपत्तियों पर विचार करके फाइल दुबारा केंद्र के पास भेजती है। इस तरह नामों को एक – दूसरे के पास भेजने का यह क्रम जारी रहता है और देश में मुकदमों की संख्या दिन प्रति दिन बढ़ती जाती है।
भारतीय न्याय व्यवस्था में जजों की नियुक्ति वाले कॉलेजियम सिस्टम पर राष्ट्रीय लोक समता पार्टी(RLSP) के राष्ट्रीय महासचिव सह मुख्य प्रवक्ता माधव आनंद से NTC NEWS MEDIA से की खास बातचीत करते हुए बताया कि भारत की न्यायपालिका के आंकड़े सिद्ध करते हैं कि भारत की न्याय प्रणाली में सिर्फ कुछ घरानों का ही कब्जा रहा है । साल दर साल इन्हीं घरानों के वकील या जजों के लड़के/लड़कियां ही जज बनते रहते हैं ।
इस विषय पर राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के महासचिव माधवानंद अपने विचार व्यक्त करते हुए कहते हैं कि कॉलेजियम व्यवस्था को भारतीय न्याय व्यवस्था में अभिशाप की तरह मानता हूं। सुप्रीम कोर्ट एवं हाईकोर्ट में जजों की बहाली की जो प्रक्रिया है दोषपूर्ण बहाली की प्रक्रिया है यानी कोई पिता जज हो एवं रिटायर होते होते अपने पुत्र को उत्तराधिकारी चुन देता हो यह कहां तक न्याय पूर्ण है…..?
उन्होंने कहा कि संविधान में लिखा है कि किसी भी बहाली की प्रक्रिया कंपटीशन के माध्यम से होनी चाहिए। यदि आप में योग्यता है तो कंपटीशन में बैठिए और उसके अनुसार चयन की प्रक्रिया होती है जिसमें समाज के सभी वर्गों का रिप्रेजेंटेशन होता है किंतु कॉलेजियम सिस्टम में ऐसा नहीं हो पा रहा है जो कि दोषपूर्ण है।
इसके साथ ही उन्होंने कहा कि अब सुप्रीम कोर्ट के भी कई रिटायर्ड व मौजूदा जज इस मुद्दे को लेकर मुखर हुए हैं एवं मांग कर रहे हैं कि कॉलेजियम भारतीय न्याय व्यवस्था का दोषपूर्ण व्यवस्था है अर्थात इस व्यवस्था के तहत जजों की बहाली नहीं होनी चाहिए।
केंद्र की सरकार की ओर इशारा करते हुए उन्होंने कहा कि अब यह मुद्दा हर स्तर से उठने लगा है एवं केंद्र की सरकार पूर्ण बहुमत की काफी मजबूत सरकार है जिस को प्रचंड बहुमत मिला हुआ है अगर अब सरकार इस पर कोई स्टैंड नहीं लेती है तो आखिर कब स्टैंड लेगी।
उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट, कोर्ट के लिए सुप्रीम है भारत के संविधान के लिए, संसद से सुप्रीम कोई नहीं है।
इसके साथ ही उन्होंने केंद्र सरकार की मंशा पर सवालिया निशान लगाते हुए कहा कि यदि केंद्र सरकार की मंशा सही हो तो मुझे नहीं लगता है कि जुडिशरी में एवं पार्लियामेंटेरियन में कोई मतभेद पैदा होगा, इस सिस्टम को हटाने में। क्योंकि जब सुप्रीम कोर्ट के आदेश को संसद में क्रॉस किया जा सकता है तो क्या कॉलेजियम सिस्टम को हटाने के लिए कुछ नहीं किया जा सकता है…???
उन्होंने कहा कि भारत के आजादी के 70 वर्ष बाद भी पूरी तरह से जात पात खत्म नहीं हुआ है बल्कि आज भी किसी गांव में चले जाइए आपको जाते ही मालूम चल जाएगा कि यह अमुक जाति का टोला है। सवर्ण टोले में चले जाइए तो उनके मकान को देखकर ही मालूम चल जाएगा कि यह सवर्ण का टोला है। अर्थात अभी भी गैप बहुत ज्यादा है जब तक इस गैप को पूरा नहीं करेंगे, सब लोगों का रिप्रेजेंटेशन नहीं होगा, तब तक तो दिक्कत है ही। तो मुझे यही लगता है कि सरकार को इस पर निर्णय लेना चाहिए।
पाठकों को यह बताना जरूरी है कि UPA सरकार ने 15 अगस्त 2014 को कॉलेजियम सिस्टम की जगह NJAC (राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्त‍ि आयोग) का गठन किया था लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने 16 अक्टूबर 2015 को राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) कानून को असंवैधानिक करार दे दिया था. इस प्रकार वर्तमान में भी जजों की नियुक्ति और तबादलों का निर्णय सुप्रीम कोर्ट का कॉलेजियम सिस्टम ही करता है।
NJAC का गठन 6 सदस्यों की सहायता से किया जाना था जिसका प्रमुख सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस को बनाया जाना था इसमें सुप्रीम कोर्ट के 2 वरिष्ठ जजों, कानून मंत्री और विभिन्न क्षेत्रों से जुड़ीं 2 जानी-मानी हस्तियों को सदस्य के रूप में शामिल करने की बात थी।
NJAC में जिन 2 हस्तियों को शामिल किए जाने की बात कही गई थी, उनका चुनाव सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस, प्रधानमंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता या विपक्ष का नेता नहीं होने की स्थिति में लोकसभा में सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता वाली कमिटी करती. इसी पर सुप्रीम कोर्ट को सबसे ज्यादा आपत्ति थी।
( फोनलाइन पर हुई बातचीत पर आधारित)
( फोटो एवं आर्टिकल तथ्य क्रमशः गूगल एवम दैनिक जागरण से साभार)

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