आज नवीन बाबू करा रहे हैं ” गांव की सैर”

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छत्तीसगढ़। किताबों और फिल्मों में गांव हमें खूब लुभाते हैं. कभी-कभी जाने हो तो रोमानियत भी महसूस होती है और सोशल मीडिया के दौर में तो लाइक-कमेंट भी खूब बटोरे जा सकते हैं. हम बटोरते भी हैं. महीने दो महीने या साल भर के दौरे हमें जमीन से जुड़े होने का भ्रम बनाए रखने का भी काम करते हैं. इंसानी फितरत भी यही है कि वह हकीकत से ज्यादा भ्रमों के आसपास ज्यादा खुश रहता है.

खैर विमर्शों और अपराधों की दुनिया से जब आप गांव को देखें या पढ़ेंगे तो आपको यह अहसास होगा कि गांव का गुणा-गणित इतना भर है कि गांव की दबंग जातियां मजे कूट रही हैं और दलित या आर्थिक रूप से कमजोर शोषित और प्रताड़ित किए जा रहे हैं. जो की हकीकत का एक पहलू भर है. जिन्हें आप मीडिया और राजनीतिक विमर्शों की दुनिया में दबंग कहकर पुकारते-धुतकारते हैं. उनकी जिंदगी इतनी सपाट और शोषण-कर्ता भर की नहीं होती. जबकि अक्सर हम उन्हें इन्हीं चश्मों से देखते हैं और ट्रीट करते हैं.

हर गांव में किसी खास जाति की संख्या सबसे ज्यादा होती है और किसी धर्म की भी. ऊपर से प्रताड़ित करने वाली लगने वाली जातियों के भीतर के अंतर्विरोध अनदेखे कर दिए जाते हैं. जिसके कारण गांव से सामाजिक ताने-बाने को ऊपर से थोपी गई विचारधाराओं के जरिए हम एक खास किस्म के निष्कर्ष पर पहुंचकर फैसले सुनाने लगते हैं. जबकि गांवों की दुनिया इतनी सपाट और एक रेखीय बिल्कुल नहीं होती.

बात करते हैं बहुलतावादी(संख्या बल के कारण) जाति की. यह कोई भी जाति हो अमूमन लक्षण और कार्यशैली एक जैसी सी ही होती है. इन जातियों के भीतर घटने वाली घटिया कर्म या राजनीतिक उठापठक अनदेखी कर दी जाती है. गांव में पलायन का सबसे बड़ा कारण मजबूरी को बताया जाता है, जबकि पलायन के अनेक कारण होते हैं. जिनमें सबसे ज्यादा इन जातियों में संभावनाओं की तलाश होती है और दूसरा बड़ा कारण होता है अपनी ही जाति के लोगों द्वारा प्रताड़ित किया जाना और लड़ाई-झगड़े से लेकर छोटी-छोटी बातों पर लगभग हर रोज इरीटेट करना. जिस पर अक्सर कम ही बात होती है. खासकर किसान जातियों में गांव में इतनी घटिया किस्म की निचले स्तर की प्रतियोगिता लगातार एड्स के रोग की फैलती जा रही है कि या तो आप उन सब में फंसकर रहिए या गांव छोड़ दीजिए.

गांव में केवल दलित और कमजोर ही प्रताड़ित नहीं होते, बल्कि अच्छी खासी मेहनत करके जीवनयापन करने वाले लोगों को भी मजबूरी में गांव छोड़ना ही पड़ता है. हम शहरी समाज का मजाक उड़ाते हैं कि उन्हें पड़ोसी का भी नहीं पता होता कि कौन हैं? जबकि गांव में आजकल यही सब करना मजबूरी बनता जा रहा है. आपको परेशान करने के लिए वहां कोई-न-कोई मिल ही जाएगा. घर, परिवार, कुनबे या आपकी ही जाति का. जिससे परेशान होकर आप या तो गांव छोड़ देंगे या उनके चक्कर में पड़ कर थाने-तहसील के चक्कर काटते फिरेंगे. छोटी-छोटी बातों और छोटे-छोटे लालचों बाबत लड़ाई वहां रोजाना का काम हैं.

सरकारी नौकरी लगे हुए परिवार को विशेष रूप से उकसाया जाता है, ताकि लड़ाई झगड़ा हो और या तो वो मजबूरी(सरकारी नौकरी बचाने के लिए) आपके सामने झुकें या आप समझौते में उनसे पैसे की उगाही करवा लें. सेलेब्रेटियों को लगता है कि उनके बारे में ही उलटी-सीधी गॉसिफ चलती है, जबकि गांव का मूल चरित्र गॉसिफ पर ही टिका हुआ है. वहां आपको बैठे-बिठाए सभी के बारे में बाहर-भीतर की सभी जानकारियां मिल जाएंगी. इसके लिए ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ती. गांव में इस काम के लिए औरतों और पुरुषों के कुछ खास ठहिए होते हैं, वहां जाने भर की देर होती है. हर गांव अपने आप में पूरा का पूरा रागदरबारी(श्रीलाल शुक्ल का उपन्यास) होता है और आज के संदर्भों में वहां जीता-जागता सोशल मीडिया मौजूद होता है. सोशल मीडिया का पूरा चरित्र गांव की फोटोकॉपी मान लीजिए. यहां नया कुछ नहीं हो रहा. जैसे यहां झुंड या गैंग बने हुए हैं, वैसे ही वहां मिलेंगे. यहां की तरह वहां राजनीतिक दलों के भक्त वैसे ही गाली-गलौच करते हुए मिलेंगे. मां-बहन करते हुए मिलेंगे. सास-बहू साजिश मिलेगी. राजनीतिक दांव-पेंच मिलेंगे. आदर्शवादी बातों की जखीरा मिलेगा. ढोंग मिलेंगे. भाईचारे की दुहाई देने वाले मिलेंगे. उन्हीं में से अपने भाई का हिस्सा हड़पने वाले मिलेंगे. बाप-बेटे के झगड़े मिलेंगे. शहरी समाज और संस्कृति को गालियां देने वाले मिलेंगे.

अंत हर कोई अपने गांव के गुणगान करता हुआ मिलेगा औऱ परेशान इंसान भी चुपचाप हां में हां मिलाता हुआ मिलेगा. जैसे हम सभी मरने की हालत में भी भारत माता की जय करना नहीं भूलते और भारत की महानता गुणगान करते नहीं थकते. वैसे ही हालात वहां है. सो प्लीज! गांव का महिमामंडन बंद कीजिए. ऊपर लिखे गए बतंगड़ को कृपया दिल पर मत लीजिए, जरा सोचिए. हमें महिमामंडन की जरूरत है या अपने बिगड़ते हालातों का जायजा लेने की औऱ उनकी आलोचना करने की. आपने यहां तक पढ़ा उसके लिए बहुत-बहुत शुक्रिया. अंत में तथाकथित दबंग जातियां अपने समाज के भीतर भंयकर किस्म की प्रताड़ित होनी वाली जाति भी होती है. इसे भी आपको देखना-समझना चाहिए.

सभार : डॉक्टर नवीन रमन जी

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