आईसा, एपवा छात्रा संवाद से लिए गए प्रस्ताव:-

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NTC NEWS MEDIA 

पटना वीमेंस काॅलेज की फरहीन ने छात्रा संवाद के अंत में 11 सूत्री प्रस्ताव पढ़ा और आने वाले दिनों में संघर्ष को मजबूत करने पर चर्चा की…..

@छात्रा संवाद से लिए गए प्रस्ताव:-

1. विगत दिनों देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों में छात्राओं ने बेहतर शैक्षणिक व्यवस्था और लैंगिक भेदभाव के खिलाफ आवाज उठाई है। बीएचयू, छतीसगढ़ लाॅ विश्वविद्यालय, जेएनयू, दिल्ली विवि, जादवपुर, बिहार के विभिन्न विश्वविद्यालयों में लड़के और लड़कियों के लिए एक तरह के नियम बनाने, यौन उत्पीड़न का विरोध समेत कई मुद्दों पर छात्राओं ने आंदोलन किया है।हम विश्वविद्यालयों में छात्र व छात्राओं के लिए अलग-अलग नियम व व्यवस्था का विरोध करते हैं और स्कूलों व काॅलेज-विश्वविद्यालयों में छात्राओं के साथ होने वाले भेदभाव को पूरी तरह खत्म करने की मांग करते हैं।

2. आजाद कहे जाने वाले देश में अच्छी और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा हर लड़की का अधिकार है। शिक्षा के बगैर एक मुनष्य का संपूर्ण विकास का रास्ता नहीं खुल सकता। हमारी सरकार शिक्षा पर बजट घटाते जा रही है। शिक्षा के निजीकरण और देशी-विदेशी महंगे विश्वविद्यालयों के कारण छात्राओं का एक बड़ा हिस्सा अच्छी शिक्षा से वंचित है। वहीं बिहार के सरकारी हाईस्कूलों में न पर्याप्त शिक्षक हैं, न पुस्तकालय और न ही प्रयोगशाला। काॅलेज परीक्षा का फार्म भरवाने और परीक्षा दिलवाने के अतिरिक्त बंद रहते हैं। ऐसे में बेटी पढ़ाओ नारे का क्या मतलब है? हम लड़कियां पढ़ना चाहती हैं. इसलिए पंचायत स्तर पर काॅलजों की व्यवस्था की मांग करते हैं।

3. आज बिहार के ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं को पुराने विचारों में बांधने की कोशिश हो रही है. अंधविश्वासों को बढ़ावा, डायन के नाम पर उत्पीड़न, विधवा महिलाओं की उपेक्षा, बाल विवाह, दहेज उत्पीड़न जैसी समस्याएं घटने का नाम नहीं ले रही हैं। अपनी छवि चमकाने के लिए सरकार विज्ञापनों पर पैसा खर्च करती है. इसके बदले शिक्षा और रोजगार का साधन का मुकम्मल इंतजाम की जरूरत है।

4. भारतीय संस्कृति के नाम पर आखिर क्यों लड़कियों से उम्मीद की जाती है कि वह चुप रहें। सिर झुका कर हर अत्याचार और भेदभाव को बर्दाश्त करें। महिलाओं द्वारा अपने सम्मान की मांग को इस रूप में चित्रित किया जाता है कि इससे परिवार टूट जाएगा। घर-घर में झगड़ा लग जाएगा. इसके उलट हम सवाल करना चाहते हैं कि स्त्री के सम्मान, बराबरी और अधिकार को कुचलकर किसी परिवार या समाज की नींव कैसे मजबूत हो सकती है? आधी आबादी का हक मारकर पूरा समाज कैसे विकास कर सकता है?

5. हम छात्राओं की समझ है कि हमारी समस्याएं पूरे समाज की समस्याएं हैं और इसी तरह समाज के अन्य तबके के साथ होने वाले भेदभाव से हम महिलाएं/लड़कियां भी प्रभावित होती हैं। आज समाज में दलित, कमजोर या अल्पसंख्यक हिस्से पर जो अत्याचार है वह हमें भी प्रभावित करता है। इसलिए ऐसे तमाम भेदभाव के खिलाफ हम संघर्ष करेंगे। हम 1857 की क्रांति जिसे भारत का पहला स्वतंत्रता संग्राम कहा जाता है कि नायिकाएं लक्ष्मी बाई, झलकारी बाई, हजरत महल हों या बाद में अशिक्षा, छुआछुत, भेदभाव आदि के खिलाफ संघर्ष करने वाली सावित्री बाई फुले व अन्य महिलाएं, हम इतिहास की इन महिलाओं से प्रेरणा लेकर हर समुदाय की लड़कियां को एकजुट कर संघर्ष करने का संकल्प लेते हैं।

6. हम समाज के भीतर कभी झूठे लवजेहाद का शोर मचाकर, कभी किसी लड़की द्वारा अपनी मर्जी से विवाह कर लेने पर उस जोड़े पर अत्याचार, हत्या या समाज में तनाव पैदा करने की कोशिशों का विरोध करते हैं और संविधान द्वारा दिए गए अधिकारों के साथ हर व्यक्ति के जीने के अधिकार का पक्ष लेते हैं।

7.> कभी दलितों के मंदिर प्रवेश से भगवान अपवित्र हो जाते हैं तो कभी महिलाओं के प्रवेश से। केरल के भगवान अयप्पा के मंदिर में स्त्रियों के प्रवेश की अनुमति सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में दी है। आरएसएस व भाजपा जो पहले मंदिर प्रवेश के पक्ष में थे, चुनावी फायदा लेने के लिए केरल में धर्मिक उन्माद पैदा कर परंपरा के नाम पर महिलाओं को मंदिर प्रवेश से रोक रही हैं। जबकि तथ्य यह है कि उस मंदिर में 1980 के दशक तक महिलाओं के प्रवेश पर रोक नहीं थी। इस संदर्भ में मंत्री स्मृति ईरानी के वक्तव्य की हम निंदा करते हैं। हम भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को गिरफ्तार करने की मांग करते हैं। जो परंपरा के नाम पर खुल कर उन्माद पैदा करने में लगे हुए हैं। मंदिर प्रवेश की कोशिश करने वाली महिलाओं पर हमला करने के जरिए इन लोगों ने अपना असली रूप उजागर कर दिया है कि ये समाज में पुरुष और महिलाओं के बराबर के अधिकार को और संविधान को भी स्वीकार नहीं करते हैं।

8.> हम मीडिया, फिल्म और साहित्य जगत की महिलाओं द्वारा चलाए जा रहे Mee Too  अभियान का भी समर्थन करते हैं और महसूस करते हैं कि उच्च पदस्थ महिलाएं हों या कृषक, मजदूर या असंगठित क्षेत्र की महिलाएं, यौन उत्पीड़न को महिलाओं के खिलाफ हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है।

9.> छात्राओं के बीच समसामयिक विषयों पर चर्चा, उनके भीतर वैज्ञानिक सोच विकसित करने की कोशिश, सांस्कृतिक गतिविधियों आदि के लिए हम आपस में समन्वय बनाकर पूरे बिहार में प्रयास करेंगे। लड़कियों को अपने शरीर को लेकर हीनता, लज्जा व संकोच से बाहर निकल खुद को सक्षम बनाने और संकोच व भय को खत्म करने के लिए शारीरिक शिक्षण-प्रशिक्षण का आयोजन चलाने का भी प्रयास करेंगे।

10> बिहार के कस्तूरबा विद्यालयों में छात्राओं की बदहाल स्थिति, डीका कांड, त्रिवेणीगंज कांड ने दिखाया है कि सरकार गरीब, कमजोर, दलित वर्ग से आने वाली छात्राओं के न्याय की उपेक्षा कर रही है। हम दलित छात्रावासों, कस्तूरबा विद्यालयों की स्थिति का सर्वे कर शीघ्र ही सरकार के समक्ष अपनी मांग पत्र रखेंगे।

11. हाइस्कूलों व काॅलेजों में जीएसकैस बनाने की मांग पर आने वाले समय में अपना आंदोलन तेज करेंगे।

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