अगर हम आपके खजाने में हाथ डालकर देखने लगेंगे तो भारत की गरीब जनता का खून मिलेगा: रवीश कुमार

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पूर्वी चंपारण/नकुल कुमार साह

पूर्वी चंपारण। रेमन मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित वरिष्ठ पत्रकार एनडीटीवी के मैनेजिंग एडिटर चंपारण के लाल रवीश कुमार का कल अरेराज के स्थानीय होटल में सम्मान समारोह का आयोजन किया गया।

अपनी व्यक्ति की शुरुआत उन्होंने अपनी मातृभाषा भोजपुरी से की। इस दौरान उन्होंने कहा कि भोजपुरी हमार माई हई, हिंदी हमार मौसी हई, अंग्रेजी हमार चाची हई

पत्रकारों को संबोधित करते हुए उन्होंने भोजपुरी में ही कहा कि बहुत जरूरी बा कि समाज में अच्छाई की भावना बची रहे। आ लबरा लोग से घबराए के नईखे उनकर दस 20 साल गिनल बंद कर दी

उन्होंने कहा कि समाज एवं दुनिया जिस तरह से बदल गई है उसमें पत्रकार होना बहुत मुश्किल है। अब सरकारी इतना प्रयास करती हैं कि कोई पत्रकार न बचे। जब सारे पत्रकार खत्म कर दिए गए और जो बचे उनका फोन टेप किया जाने लगा ।
उन्होंने कटाक्ष करते हुए कहा कि अगर हम आप के खजाने में हाथ डालकर देखने लगेंगे तो भारत की गरीब जनता का खून मिलेगा। वहां पर जिसके दम पर आप हुकूमत चला रहे हैं और राजनीतिक सफलता प्राप्त कर रहे हैं और हम आपके गिरेबान में हाथ डाल देंगे तो वहां सिर्फ और सिर्फ गरीब जनता की खून मिलेंगे। जिन हजारों करोड़ों रुपए फूंक कर आप चुनाव जितने हैं और दुनिया में अपनी सफलता का ढिंढोरा पीटते हैं।

हमको वह बात साबित करने के लिए इजराइल के पैक्सस सॉफ्टवेयर की जरूरत नहीं है। और हम अभी ना इतने छोटे हुए हैं, ना ही हमारा दिल इतना छोटा हुआ है कि आपके होंठ और हाथ दोनों बधाई देने से पहले ही कांप गए।

आश्चर्य मुद्रा में रवीश कुमार कहते हैं कि “तो यह क्यों हो रहा है…? पूरी दुनिया में ट्रायल एवं एरर के प्रयोग करते करते सरकारें अब समझ गई हैं की जनता को जितना ज्यादा अंधेरे में रखा जाए हमारी हुकूमत उतनी ही चमकेगी और जनता को अंधेरे में रखा जा सकता है। खासकर भारत जैसे देश में जहां हर किसी को अच्छा स्कूल अच्छा कॉलेज नहीं मिलता है।

अपने शैक्षणिक दिनों को याद करते हुए  उन्होंने कहा कि हमलोग जब पटना छोड़कर दिल्ली गए तो एक फर्क पता चला, अब जब मैं दुनिया की यूनिवर्सिटी में जाता हूं कोलंबिया जाता हूं या अन्य जगह हो जाता हूं तो पता चलता है कि उससे भी ज्यादा फर्क है।

लेकिन यह एक अंतर आ गया है इसमें। ऐसा नहीं है कि आप प्रतिभाशाली नहीं है, आपमें क्षमता नहीं है। आपने क्षमता बहुत ज्यादा है लेकिन आपको मौका नहीं मिलता है, आपको वह चीजें जो इस दुनिया को समझने के लिए, इस दुनिया के पब्लिक स्पेस में मंचो पर खड़ा होने के लिए जरूरी थी, वह आपको नहीं मिली। अगर आपको मिली होती, आप अपने जवानी के दिनों में उन चीजों से गुजर रहे होते, तो आपका अपना परफॉर्मेंस जो आज है उससे कहीं ज्यादा अच्छा होता।

हमलोगों के भीतर आकांक्षाएं बहुत हैं महत्वाकांक्षाए बहुत है और हासिल बहुत कम है। मन मसोसकर रह जाते हैं कि मिला नहीं, कर सके थे, कर नहीं सके। वह इसलिए कि एक सिस्टम के तहत, नीतियों के तहत आपको ज्ञान के दुनिया से वंचित रखा गया, सूचनाओं की दुनिया से वंचित रखा गया।

हर तरह की असमानता रहती है दुनिया में, कमाई के माध्यम से हम और आप में काफी अंतर हो जाएगा, मुकेश अंबानी से तो और भी ज्यादा अंतर हो जाएगा, लेकिन जो नॉलेज की इनिक्वालिटी है उसे अब तक किसी ने नहीं पहचाना है। यह क्यों है जहां बिहार के लाखों की संख्या में छात्र अभी भी इस मामले में मिल जाएंगे जो 10 घंटा पढ़ते होंगे, उनकी मेहनत में कोई कमी नहीं है, उनकी इरादे में कोई कमी नहीं है, उनके पढ़ाई के तरीके में कमी है और और यह पढ़ाई के तरीके में कमी किसने पैदा की…? इस सिस्टम ने पैदा की। सिस्टम कौन बनाता है… वह जिनको शिक्षा नीति बनानी चाहिए, वह काम छोड़कर मंदिर बनवाते हैं।

हम सबने अपने भविष्य को, अपने भीतर, अपने दोस्तों में, अपने रिश्तेदारों में अपने सपनों को इतनी बार मरते हुए देखा है कि अब हमको फर्क ही नहीं पड़ता है की पूछ ले कि साढे 5 साल हो गया कभी एजुकेशन पर भी बात कर ले । बड़ी गंभीर स्वर में रवीश कुमार पत्रकारों की तरफ प्रश्न फेंकते हुए कहते हैं कि सुना है आपने उनसे (प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी) कभी एजुकेशन पर बात करते हुए।

कोई यूनिवर्सिटी का आईडिया दे देते हैं वह फिल्म कलाकारों के बीच जाते हैं तो कहते हैं कि की फिल्म की यूनिवर्सिटी होनी चाहिए लेकिन वे फिल्म इंस्टीट्यूट के लिए आज तक एक डायरेक्टर नहीं ढूंढ पाए और एक ढूंढ पाए तो चला गया एक्टिंग करने।

उन्होंने कहा कि कुछ भी आईडिया दे देते हैं आप नीतीश कुमार जब पटना यूनिवर्सिटी के सौ साल होने पर कहते हैं कि इस सेंट्रल यूनिवर्सिटी का दर्जा दे दिया जाए वह भी कोई बहुत बड़ी मांग नहीं थी आप 15 साल से सरकार चला रहे हैं आप यह बात बताएं कि इन 15 साल में आपने एक यूनिवर्सिटी तो बेहतर की होगी ना। हम एक की भी उम्मीद नहीं करेंगे तो फिर आप कौन सी महत्वाकांक्षा अपने भीतर लेकर राजनीतिक दलों के बीच चल रहे हैं या तो यह बेईमानी आपके भीतर है या आपके पीछे चलने वालों में है या फिर जो आपके आगे चल रहे हैं और जो आपको अपने पीछे चला रहे हैं उनके भीतर है।

तो उन्होंने कहा कि हम यूनिवर्सिटी की रैंकिंग करेंगे अरे भाई पहले आप यूनिवर्सिटी तो बेहतर कर दीजिए। जहां टीचर नहीं है, लाइब्रेरी नहीं है, फंड नहीं है और आप पटना में खड़ा होकर बोलते हैं कि हम 10,000 करोड़ देंगे यह 2017 का साल था। हजार करोड़ भी आपने नहीं दिया।

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